UNIT 1 Activity 1
मेघ आए कविता
कवि परिचय
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
जन्म : 15 सितंबर 1927
पिता का नाम : विश्वेश्वर दयाल
जन्म स्थान: बस्ती जिला (उत्तर प्रदेश)
यह बचपन से ही विद्रोही प्रकृति के थे। इलाहाबाद से उन्होंने बी. ए. और सन् 1949 में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की सन 1964 में अज्ञेय जीके निवेदन से दिल्ली आकर दिनमान पत्रिका से जुड़े अज्ञेय जी के साथ में काफी कुछ। 1982 मेरे प्रमुख बाल पत्रिका पराग के संपादक बने। इसी बीच उनकी पत्नी विमला देवी का निधन हो गया।
उन्होंने नाटक, कहानी, उपन्यास, कविता इत्यादि लिखें। उन्होंने अपने जीवन काल में अनेक रचनाएं किए जिनमें है- एक सूनी नाव, गर्म हवाएं, जंगल का दर्द, पागल कुत्तों का मसीहा, मंहगू की टाई (बाल नाटक), बकरी (नाटक)। उन्होंने नेपाली कविताएं शीर्षक से एक काव्य संग्रह का भी संपादन किया। उन्होंने यात्रा स्मरण भी लिखें जो कुछ रंग कुछ गंध नाम से छपकर आया है। उनके कविता संग्रह छुट्टियों पर टांगे लोग, पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला 23 सितंबर 1983 को नई दिल्ली में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का निधन हो गया।
मेघ आए कविता
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।
आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली,
दरवाजे-खिड़कियाँ खुलने लगीं गली-गली,
पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के।
मेघ आए बड़े बन-ठन के संवर के।
पेड़ झुक झाँकने लगे गरदन उचकाए,
आंधी चली, धूल भागी घाघरा उठाये,
बाँकी चितवन उठा, नदी ठिठकी, घूंघट सरके।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।
बूढ़े पीपल ने आगे बढ़कर जुहार की,
‘बरस बाद सुधि लीन्हीं’ –
बोली अकुलाई लता ओट हो किवार की,
हरसाया ताल लाया पानी परात भर के।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँ वर के।
क्षितिज अटारी गहराई दामिनी दमकी,
‘क्षमा करो गाँठ खुल गई अब भरम की’,
बाँध टूटा झर-झर मिलन के अश्रु ढरके।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।
, कविता का भावार्थ
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।
आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली,
दरवाजे-खिड़कियाँ खुलने लगीं गली-गली,
पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के।
मेघ आए बड़े बन-ठन के संवर के।
कवि कहते है की आकाश में बादल घिर आये है। बादलों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई मेहमान बन -संवर कर सज धजकर ग्राम आता है। शहर से आने वालेमेहमान को देखकर लोगों में प्रसन्नता की लहर दौड़ जाती है। बादल भी दामाद की तरह एक वर्ष बाद आये है। बादलों को देखकर लोग प्रसन्न हो जाते है। बादलों सेपहले उनके आने की सूचना देने वाली पुरवाई चल पड़ती हैजो नाचती गाती है। उस नाच गाने को देखने के लिए गलियों में खिड़की - दरवाजे खुलने लगते है।. लोग मेघ रूप दामाद को देखना चाहता है। . मेघ के आने से हवा अत्यंत प्रसन्न हो गयी है और प्रकृति में उत्साह का वातावरण है।
पेड़ झुक झाँकने लगे गरदन उचकाए,
आंधी चली, धूल भागी घाघरा उठाये,
बाँकी चितवन उठा, नदी ठिठकी, घूंघट सरके।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।
मेघरूपी मेहमान बादल के रूप में आते है। मेहमान के आने पर जिस प्रकार लोग झुककर प्रणाम करते है और फिर गर्दन उच्कार झंकार देखते है उसी तरह बादल के आने पर पेड़ हवा के वेग से झुके और डोलने लगे। ऐसा लगता है जैसे अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए कुछ ग्रामीण अतिथि को देख रहे हैं। धीरे धीरे हवा आंधी में बादल गयी और धुल उड़ने लगी। धुल का गुबार देखकर ऐसा लगता है, जैसे कोई ग्राम की युवती किसी अनजाने व्यक्ति को देखकर अपना लहगा समेटकर भागी चली जा रही है। बादलों का घिरना नदी के लिए भी अच्छा समाचार है, वह भी रुक कर देखने लगी है। कहने का अर्थ या है की जिस पर शहर के मेहमान गौण में सज धज कर संवर कर आते है, ठीक उसी प्रकार मेघ भी मानों बन थान कर अतिथि के रूप आये हो।
बूढ़े पीपल ने आगे बढ़कर जुहार की,
‘बरस बाद सुधि लीन्हीं’ –
बोली अकुलाई लता ओट हो किवार की,
हरसाया ताल लाया पानी परात भर के।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।
कवि कहते है कि जिस प्रकार मेहमान के आने पर घर के बड़े - बुजूर्ग उनका स्वागत करते है, उनका अभिवादन करते है तथा घर की बहुवें किवाड़ या दरवाजे की ओट में से उनसे स्नेहभरे स्किय्कत करती है, उसी प्रकार मेघों के मेहमान के रूप में आने पर बूढ़े पीपल ने अभिवादन किया। हवा के झोंकों से लता लहरा रही है, मानों मेघों से शिकायत कर रही हो कि आप बहुत दिनों के बाद आये हो। पोखर - तालाब हर्ष झूम रहे है, मानों मेहमान के स्वागत के लिए परात भर के पानी लाया हो। मेघों के आने पर प्रकृति में हर्ष एवं आनंद है।
क्षितिज अटारी गहराई दामिनी दमकी,
‘क्षमा करो गाँठ खुल गई अब भरम की’,
बाँध टूटा झर-झर मिलन के अश्रु ढरके।
मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के।
आकाश में बादल छा गए है। क्षितिज पर गहरे बादलों में बिजली चमकी और वर्षा प्रारंभ हो गयी। झर-झर वर्षा होने लगी। इस भाव को कवि ने मेहमान और उसकी पत्नी के मिलन के रूप में चित्रित किया है। पति पत्नी जब मिले तो दोनों के मन की गाँठ खुल गयी सारी भेद दुभिदा दूर हो गयी। अब वियोग का बाँध टूट गया इसी प्रकार मेहमान के आने के बाद की खुसी और मिलन के आँसू के रूप में वर्षा का वर्णन किया गया है।
मेघ आए कविता का सारांश
मेघ आए कविता में मेघों के आने की तुलना सज कर आए प्रवासी या अतिथि (दामाद) से की है। ग्रामीण संस्कृति में दामाद के आने पर उल्लास का जो वातावरण बनता है इसी के आधार पर मेघों के आने का वर्णन करते हुए कवि ने उसी उल्लास को इस कविता में दिखाया है।
प्रस्तुत कविता मेघ आये में कवि सर्व्वेश्वर दयाल सक्सेनाजी ने मेघों का मानवीकरण द्वारा प्रकृति के विविध रूपों का बहुत सुन्दर चित्रण किया है। ग्रामीण संस्कृति में दामाद के आने पर जो उल्लास का वातावरण बनता है, उसी उल्लास को मेघरूपी मेहमान के रूप दिखाया गयी है बरसात के दिनों में बादल उमड़ उमड़ कर आसमान में छा जाते है, धुल उडती है बादल नीचे क्षितिज पर झुक आते है। बिजली चमकती और बादल बरसने लगते है. कवि ने बादलों को मेहमान के रूप में दिखाया है। यहाँ कविता में मेघों के साथ-साथ, अमराइयों, लताओं, नदियों एवं पेड़ों का भी मानवीकरण किया गया है।
मेरा अभिप्राय
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपनी इस कविता में ग्रामीण संस्कृति एवं गांव की प्राकृतिक सुंदरता का बड़ा ही मनमोहक वर्णन किया है। कवि ने यहाँ मेघों के आने की तुलना सज-धजकर आए मेहमान से की है। जिस तरह, गांव में दामाद के आने पर लोगों के मन में ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है, ठीक उसी तरह, भीषण गर्मी के बाद वर्षा के मेघ गांव में आने पर लोग बेहद उत्साहित और खुश हो जाते हैं। इस तरह कवि ने अपनी कविता में, आकाश में बादल और गाँव में मेहमान (दामाद) के आने का बड़ा ही रोचक वर्णन किया है।
जब मेघ आते हैं, तो हवा चलने के कारण धूल उड़ने लगती है, नदी के जल में उथल-पुथल होने लगती है। आसमान में बिजली कड़कती है। सारे वृक्ष झुक जाते हैं। कवि ने इन सब घटनाओं की तुलना दामाद के आने पर घर तथा गांव में होने वाली तैयारियों के साथ की है। जैसे - जीजा की सालियाँ उनके पीछे-पीछे चलती हैं और औरतें उन्हें दरवाजे के पीछे से देखती हैं और बड़े-बुजुर्ग उनका आदर-सत्कार करते है।